गुरुवार, 19 अगस्त 2010
Peepli Live is the great insult of distressed farmers of Bundelkhand : SANJAY PANDEY
Pandey said that this film is based on the suicide cases of farmers in Bundelkhand as well as in Vidarbha during last five dry years.
Peepli Live film has shown Natha, a poor farmer from Peepli village in Bundelkhand is about to lose land due to an unpaid government loan has got a quick fix to the problem is the very same government’s program that aids the families of indebted farmers who have committed suicide and as a means of survival Farmer Natha can choose to die and futher shown that His brother is happy to push him towards this unique ‘honour’ of suicide but Natha is hesitant ,this is totally untrue too much twisted from the ground reality and insult of poor dying farmers of Bundelkhand who are the victims of wrong policies of the government. So this movie has diverted from the basic issue of farmers' suicide and hurt the sentiments of the rural folk.
"Although the film released last week has been hailed by critics as one of the smartest social satires to hit the Indian screens in years, it has not gone down well with the farming community", Pandey added. Sanjay Pandey said that these critics perhaps forgot the emotional edge of innocent farmers because maximum of critics and the members of The Censor Board of Film Certification belonging to urban areas do not know the the poverty of Bundelkhand in reality. Also the central theme of the movie is the rural urban divide. Perhaps that's why the movie has received a harshly response in the metros.
According to Sanjay Pandey, Peepli Live has made big question mark to farmers' widows who are demanding compensation after their bread earner farmer's suicide due to debt and crop failure . As this movie shows that farmers had been committing suicides for getting aid where as government had already denied these cases of suicides without even visiting house of dying family members. So Peepli Live will give strong support to such politicians and bureaucrats who never accepted these suicide cases due to starvation and debt. The film has tried to prove that farmers are not forced to kill themselves due to crises where as they themselves killing for money.
Finally Pandey said, "In the country of " JAI -JAWAN, JAI-KISAN" the two hour entertainment of cinema-lovers is not much important than the respect of 60 crore farmers. Hence the film should be baned and the censorship certificate to the film should be taken back"
शनिवार, 19 सितंबर 2009
बुंदेलखंड में पनप सकता है नक्सलवाद : संजय पाण्डेय


गोबिंद दास जैसे मजदूरों के अलावा ऐसे लोग भी तंगी से गुजर रहे है जो कभी जमींदार हुआ करते थे। आज वे भी दो वक्त के भोजन के लिए संघर्षरत हैं। उनके बेरोजगार लड़के लड़कियां खाली बैठे हुए हैं ,परिणाम स्वरुप विवाह भी नहीं हो पा रहा है। निम्न वर्ग के लोग तो दिल्ली जाकर मजदूरी कर सकते हैं किन्तु यहाँ का उच्चवर्ग रूढीवादी होने के कारण भूखे रहते हुए भी चाहारदिवारी से बाहर जाने को तैयार नहीं। इसलिए ऐसे लोग अन्दर ही अन्दर घुट रहे हैं। रात रात भर जाग कर कभी सरकार को कोसते हैं तो कभी प्रकृति को। किन्तु पेट पलने का कोई रास्ता फ़िलहाल नहीं मिल पा रहा है। पिछले हफ्ते महिलाओं के बेचे जाने का मामला मीडिया में आया ,जिससे यहाँ की हकीकत देश के सामने आई।इस पर बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी के संयोजक संजय पाण्डेय का कहना है कि यदि ज्यादा समय तक प्रकृति का यही रुख रहा और सरकारों ने कोई कारगर कदम न उठाया तो यहाँ अराजकता का माहौल होगा, १०-२० रुपये के लिए छीना झपटी होगी। सरकारों की तरफ से बुरी तरह हताश हो चुके लोगों में अब आक्रोश उबाल लेने लगा है । दूर दूर तक उन्हें गुजारे का कोई रास्ता नहीं दिख रहा है,ऐसे में संभव है कि लोग नक्सलवाद की रह पकड़ लें।
बुधवार, 9 सितंबर 2009
बुंदेलखंड मसले पर सरकारे स्पष्ट करें अपना रुख : संजय पाण्डेय
केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों का प्रतिनिधितित्व करने वाले कई वरिष्ठ नेतागण जब बुंदेलखंड आते हैं तो वहां की जनता के बीच में तो पृथक बुंदेलखंड राज्य की खुली वकालत करते है किंतु वापस आते ही इस मुद्दे को भूल जाते हैं। बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी का आरोप है कि गुमराह करने का ऐसा ही क्रम पिछले 50 सालों से चल रहा है । वर्ष 1955 में फजल अली की अध्यक्षता में गठित हुए राज्य पुनर्गठन आयोग की पुरजोर शिफारिश के बावजूद आज तक बुंदेलखंड राज्य का गठन सम्भव नही हो सका। पिछले दो वर्षों से उप्र की मुखिया मायावती अपनी जनसभाओं और रैलियों में बुंदेलखंड राज्य निर्माण की तरफ़ दारी करती हैं किंतु जब इस आशय का विधेयक राज्य विधान सभा से पारित करवाने की बात आती है तो बहन जी पीछे हट जाती हैं । इसी तरह केन्द्र की यूपीए सरकार के प्रमुख नेता गण जिनमे डॉ मनमोहन सिंह तथा राहुल गाँधी स्वयं को पृथक बुंदेलखंड राज्य का हिमायती तो बताते हैं किंतु सरकार कोई संसदीय पहल नही कर रही। पार्टी संयोजक संजय पाण्डेय ने कहा कि ऐसे हालातों में यही निष्कर्ष निकलता है कि बुंदेलखंड मसले पर पूर्व की तरह सिर्फ़ बयान बाजी से काम चलाया जा रहा है। कहा कि यद्यपि राहुल गाँधी जी में बुंदेलखंड के प्रति कुछ करने की कसक है ,किंतु उनकी सोच का क्रियान्वयन भी तो जरूरी है। सोचने या बयान देने मात्र से बुंदेलखंड की समस्या का हल तो नही हो सकता।
मप्र तथा उप्र के बीच फंसे बुंदेलखंड क्षेत्र की चिर उपेक्षा का परिणाम है कि यह आज देश के सबसे पिछडे क्षेत्रों में से एक है। किंतु इसके पृथक राज्य बनने के बाद यहाँ केंद्रित विकास होने से स्थिति में सुधार आएगा । इसलिए सरकारें इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर हीला हवाली न करते हुए जल्द अपना रुख स्पष्ट करें । पाण्डेय ने बुंदेलखंड वासियों से भी पलायन और आत्महत्या का रास्ता छोड़ अपने अधिकारों के लिए क्रांति अख्तियार करने की अपील की।
बुधवार, 2 सितंबर 2009
बुंदेलखंड पर अब और राजनीति नही : संजय पाण्डेय
रविवार, 21 जून 2009
बजट-सत्र के दौरान संसद के समक्ष होगा प्रदर्शन
बुधवार, 17 जून 2009
गरीब दलितों की भावनाओं पर "डकैती" डालने के लिए स्वांग

गुरुवार, 7 मई 2009
लफ्फाजी का शिकार हुआ पृथक बुन्देलखंड राज्य का मुद्दा

गुरुवार, 12 मार्च 2009
लोकसभा प्रत्याशियों की सूची शीघ्र जारी करेगी बुएपा
मंगलवार, 20 जनवरी 2009
बुन्देलखंड के प्रति दोहरी नीति महंगी पड़ेगी बसपा और कांग्रेस को
वर्षो से हो रही कवायद के फलस्वरूप राज्य निर्माण का कार्य सिफर बना हुआ है। कभी केन्द्र सरकार प्रात निर्माण की गेंद राज्य सरकार के पाले में डाल देती है तो कभी राज्य सरकार इसे किक कर पुन: केन्द्र सरकार के पाले में पहुंचा देती है। ये राजनैतिक दल बुंदेलखण्ड में फैले भ्रष्टाचार, अकाल की स्थिति पर आसू तो बहाते है, लेकिन इन समस्याओं को जड़ से मिटाने के लिए प्रात का निर्माण करने में पीछे हट जाते है। यही बड़ी वजह है कि बुन्देलखण्ड बड़ी कीमत चुकाने के पश्चात भी प्रात के रूप में पहचान हासिल नहीं कर पा रहा है।बुन्देलखण्ड का मसौदा वर्ष 1955 में ही तय कर लिया गया था, लेकिन तत्समय इसको अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका, जिसका खामियाजा आज तक बुन्देलखंडियों को भुगतना पड़ रहा है। कई संगठन प्रात निर्माण के मुद्दे को जीवित बनाये हुए है। प्रात निर्माण के लिए बुन्देलखण्ड एकीकृत पार्टी ने उग्र आदोलनों की शुरुआत की है ,इन आदोलनों के पश्चात तेजी से सरकारों का ध्यान बुन्देलखण्ड की बदहाली पर गया . वर्तमान समय में बुन्देलखण्ड में अनेक कार्यक्रम प्रात निर्माण की लड़ाई के लिए चलाये जा रहे है। रैलियों, आदोलनों के फलस्वरूप भी प्रात अब भी देश के नक्शे पर उभर नहीं पाया है। बुन्देलखण्ड में इतना राजस्व प्राप्त होता है जो एक प्रात के लिए जरूरी है। इसके बावजूद भी सरकारे इसे प्रात का नाम देने में सकुचा रही है। बुद्धिजीवी लोगों का मानना है कि सरकारों द्वारा बुन्देलखण्ड को प्रात नहीं बनाने के पीछे बड़े राजनैतिक दल ही है . सपा जैसे भी कई दल है जो अलग प्रात बनाने पर सीधे तौर पर न कर चुके है। उन्हे लग रहा है यदि बुन्देलखण्ड राज्य बन गया तो उनका बड़ा वोट बैंक खिसक जायेगा। बुद्धिजीवी मानते है कि भले ही बुन्देलखण्ड में अशिक्षितों की बड़ी तादाद हो लेकिन समय आने पर इस क्षेत्र के लोग ऐसे राजनैतिक दलों को सबक सिखा देंगे।आगामी लोकसभा चुनाव में यहाँ की जनता इनसे खुलकर बदला लेने के मूड में है
बुन्देलखंड के प्रति दोहरी नीति महंगी पड़ेगी बसपा और कांग्रेस को
वर्षो से हो रही कवायद के फलस्वरूप राज्य निर्माण का कार्य सिफर बना हुआ है। कभी केन्द्र सरकार प्रात निर्माण की गेंद राज्य सरकार के पाले में डाल देती है तो कभी राज्य सरकार इसे किक कर पुन: केन्द्र सरकार के पाले में पहुंचा देती है। ये राजनैतिक दल बुंदेलखण्ड में फैले भ्रष्टाचार, अकाल की स्थिति पर आसू तो बहाते है, लेकिन इन समस्याओं को जड़ से मिटाने के लिए प्रात का निर्माण करने में पीछे हट जाते है। यही बड़ी वजह है कि बुन्देलखण्ड बड़ी कीमत चुकाने के पश्चात भी प्रात के रूप में पहचान हासिल नहीं कर पा रहा है।बुन्देलखण्ड का मसौदा वर्ष 1955 में ही तय कर लिया गया था, लेकिन तत्समय इसको अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका, जिसका खामियाजा आज तक बुन्देलखंडियों को भुगतना पड़ रहा है। कई संगठन प्रात निर्माण के मुद्दे को जीवित बनाये हुए है। प्रात निर्माण के लिए बुन्देलखण्ड एकीकृत पार्टी ने उग्र आदोलनों की शुरुआत की है ,इन आदोलनों के पश्चात तेजी से सरकारों का ध्यान बुन्देलखण्ड की बदहाली पर गया . वर्तमान समय में बुन्देलखण्ड में अनेक कार्यक्रम प्रात निर्माण की लड़ाई के लिए चलाये जा रहे है। रैलियों, आदोलनों के फलस्वरूप भी प्रात अब भी देश के नक्शे पर उभर नहीं पाया है। बुन्देलखण्ड में इतना राजस्व प्राप्त होता है जो एक प्रात के लिए जरूरी है। इसके बावजूद भी सरकारे इसे प्रात का नाम देने में सकुचा रही है। बुद्धिजीवी लोगों का मानना है कि सरकारों द्वारा बुन्देलखण्ड को प्रात नहीं बनाने के पीछे बड़े राजनैतिक दल ही है . सपा जैसे भी कई दल है जो अलग प्रात बनाने पर सीधे तौर पर न कर चुके है। उन्हे लग रहा है यदि बुन्देलखण्ड राज्य बन गया तो उनका बड़ा वोट बैंक खिसक जायेगा। बुद्धिजीवी मानते है कि भले ही बुन्देलखण्ड में अशिक्षितों की बड़ी तादाद हो लेकिन समय आने पर इस क्षेत्र के लोग ऐसे राजनैतिक दलों को सबक सिखा देंगे।आगामी लोकसभा चुनाव में यहाँ की जनता इनसे खुलकर बदला लेने के मूड में है
रविवार, 18 जनवरी 2009
लोक सभा चुनाव से पूर्व बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी बनाएगी एक लाख नए सदस्य
गुरुवार, 15 जनवरी 2009
बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी की संकल्प सभाए
बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी की संकल्प सभाए
बुधवार, 7 जनवरी 2009
बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी लडेगी लोकसभा चुनाव
पार्टी के संयोजक संजय पाण्डेय ने आज यहां एक होटल में पत्रकारों को राज्य निर्माण की लड़ाई पर राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति की जानकारी देते हुए बताया कि राज्य निर्माण की मांग एक राजनीतिक मांग है, इसीलिए राजनीतिक दबाव बनाए बगैर इसे पाना कठिन है। इसके लिए जरूरी है कि राज्य निर्माण समर्थक संसद में पहुंचें। इसके लिए मध्यप्रदेश व उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र की सभी सीटों व दिल्ली के बुन्देलखण्डी बहुल क्षेत्र दिल्ली बाहरी व कुछ अन्य सीटों पर प्रत्याशी खड़े किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि प्राथमिकता अपने दल के प्रत्याशी खड़े करने की रहेगी, लेकिन राज्य निर्माण के प्रबल समर्थक दूसरे दलों के प्रत्याशियों को भी समर्थन दिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में छतरपुर जिले की महाराजपुर से पार्टी के समर्थित प्रत्याशी मानवेन्द्र सिंह की जीत से उनके कार्यकर्ताओं व समर्थकों में उत्साह है। अब वे लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुट गए है।
पार्टी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष कुंवर बहादुर आदिम ने कहा कि कुछ लोग बुन्देलखण्ड का मुद्दा लेकर चुनाव जीतकर विधानसभा व लोकसभा में पहुंचे, लेकिन उन्होंने कभी इस मुद्दे को सदन में नहीं रखा। इसीलिए जरूरी है कि राज्य निर्माण के समर्थक विधायक व सांसद अपने दलों के चुनाव घोषणा पत्र में इसे शामिल कराएं। पत्रकार वार्ता में महासचिव शांति स्वरूप पस्तोर, महानगर अध्यक्ष नरेन्द्र कुशवाहा, अवधेश कुमारी पटेल, घनश्याम सिंह व अजय पाण्डेय उपस्थित रहे।
गुरुवार, 1 जनवरी 2009
बुन्देलखंड राज्य बना तो एक अत्यन्त समृद्ध राज्य होगा : संजय पाण्डेय
बुधवार, 31 दिसंबर 2008
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं !! !!
वर्ष २००९ में हिन्दी के चिट्ठाकारों की संख्या एक लाख से भी अधिक हो जायें इन्ही शुभकामनाओं के साथ ....
संजय पाण्डेय (राष्ट्रीय संयोजक)
बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी ।
मंगलवार, 30 दिसंबर 2008
भारत में राज्यों का पुनर्गठन हो : संजय पाण्डेय
शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008
रेल संपर्क से खजुराहो में पर्यटन व्यवसाय समृद्ध होगा
बुन्देली भाषा को संविधान की अनुसूची आठ में शामिल किया जाए : संजय पाण्डेय
भारतीय संविधान में मान्यता प्राप्त भारतीय भाषाओँ को अनुसूची क्रमांक आठ में रखा गया है और इन भाषाओँ के संवर्धन के लिए अलग से राजभाषा आयोग की व्यवस्था भी संविधान में है ।संविधान की आठवी अनुसूची में कई भाषाएँ तो ऐसी हैं जिनके प्रयोगकर्ता एक करोड़ से कम है (असमिया -89 लाख, मैथिली-61 लाख, संथाली-37 लाख, कश्मीरी - 24 लाख , कोंकणी-15 लाख, नेपाली-13 लाख़, डोगरी-13 लाख़, सिंधी-12 लाख ) किंतु हमारे देश में चार करोड़ बुन्देली भाषी लोग हैं फ़िर भी बुन्देली भाषा को मान्यता प्रदान करते हुए इसे अनुसूची -8 में शामिल नही किया गया ।
बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी के संयोजक संजय पाण्डेय के अनुसार बुन्देली भाषा को राजकीय संरक्षण न मिलने से बुन्देली साहित्य और साहित्यकारों की दुर्दशा हो रही है किन्तु बुन्देलखंड क्षेत्र के सांसद इस विषय को संसद में उठाने की जरूरत ही नहीं समझते हैं । इसलिए बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी ने अपने एजेंडे में पृथक बुन्देलखंड राज्य निर्माण के साथ साथ बुन्देली भाषा को सम्मान दिलाते हुए इसे संविधान की आठवी अनुसूची में शामिल करवाना अपने उद्देश्यों की उच्च वरीयता में रखा है ।
